ला ेकोक्ति/मुहावरा ें म ें र ंग भावों के स ंग

डा ॅ. सुषमा श्रीवास्तव
2017 Zenodo  
लोका ेक्ति का सीधा संब ंध जनसामान्य क े अभिव्यक्ति पक्ष स े है। ला ेका ेक्ति की प ृष्ठभूमि में मानव-जीवन के यथार्थ का अनुभव सन्निहित होता ह ै। यह चिरंतन सत्य से संब ंधित हा ेती है। ला ेकोक्ति अपने आप में प ूर्ण होती ह ै। यह स्वतंत्र रूप से विष ेष अर्थ का े ध्वनित करती है। लोका ेक्ति ओर मुहावरे भाषा के उत्कर्ष का विधान करते ह ै ं। इनके प ्रया ेग से भाषा में सजीवता, सरसता, चित्रात्मकता व प ्रभावा ेत्पादकता का समावेष होता ह ै।'मुहावरा' षब्द अरबी भाषा से निकला ह ै जिसका मूल अर्थ है 'अभ्यास' या
more » ... है 'अभ्यास' या 'बातचीत' किन्तु अब इस षब्द से एक विष ेष अर्थ ध्वनित होता ह ै। मुहावरा ें का प ्रया ेग वाक्य मे ंवाक्यांष के रूप में हा ेता है। "लिखित अथवा काव्य भाषा मे ं प ्रचलित वह वाक्या ंष जिसका अर्थ सामान्य अर्थ से विलक्षण होने क े कारण लक्षणा अथवा व्यंजना द्वारा सिद्ध होता ह ै उसे मुहावरा कहते ह ैं।" हम इसे लक्षणा प्रधान भाषा भी कह सकते हैं। मानव जीवन में रंगा ें का एक विषिष्ट स्थान है। रंग हमारी स्वस्थ सांस्कृतिक परम्परा क े द्योतक ह ै। रंग विधान दर्षक की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालता ह ै। जहाँ रूचि के रंग मानव का े आनंद से भर देते ह ैं वही ं अपि ्रय रंग उसक े मानस पर विपरित प्रभाव डालते ह ैं।भाव एक गति है जो दर्ष क के हृदय का े आलोकित करने की क्षमता रखती ह ै। भावों का े मनोविकार भी कहा जाता है। किसी वस्तु का े देखकर मन में किसी प्रकार की हलचल अथवा विकृति उत्पन्न होती है जिसक े कारण हम उस वस्तु के प्रति आकृष्ट या विकृष्ट हा ेते है ं, इसी प ्रकार की जो मन की स्थितियाँ हा ेती ह ै वे भाव कही जाती हंै ज ैसे - प्र ेम, घ ृणा, उदासीनता आदि। भावों का रस से घनिष्ठ संब ंध ह ै। षास्त्रा ें में स्थायी भावा ें से ही रसों की निष्पति मानी गई है। प ्रेम, उत्साह, षोक, क्रोध, भय निर्वेद, घ ृणा, विस्मय व हास को स्थायी भाव मानकर नवरसों का विधान किया गया ह ै। संचारी भावा ें की संख्या तैंतीस है किन्तु ये अधिक भी हो सकते ह ैं।
doi:10.5281/zenodo.889284 fatcat:d4pvodpf3ndvfa4i4qfzhsm2hq